आज-कल एक नई बहस छिड़ी हुयी है. देसी विदेशी की. हर चीज़ का देशीकरण करने की धुन सवार हो चुकी है. वो अलग बात है कि शहद में चीनी शुगर सिरप मिलकर “भारत में निर्मित” का स्टीकर लगाकर बेचा जा रहा है. देशीकरण और स्वदेशी की बात करना अच्छी बात है. लेकिन इसे भावनाओं की चासनी में लपेटकर एक-दूसरे में नफरत फैलाना गलत है. समय की मांग के अनुसार और अपनी सुविधा के अनुसार किसी भी चीज़ को अपनाना बिलकुल गलत नहीं है. क्योंकि भारत की संस्कृति दूसरों की अच्छी चीज़ों, विचारों और संस्कारों को अपनाने की रही है

आपको आज भारत के हर घर की रसोई में आलू मिल जायेगा. ज़्यादातर लोगों को यह मालूम नहीं है कि आलू एक विदेशी सब्ज़ी है. जो आज हर सब्ज़ी का राजा बना बैठा है. इसे पुर्तगाली लेकर आये थे. 17 वीं शताब्दी में पुर्तगाली मसालों के व्यापर के लिए भारत आये तो वो अपने साथ आलू को लेकर आये. आलू भारत के लोगों की पसंद बन गया. यहां तो आलू के नाम पर कई व्यंजनों के नाम भी रखे गए हैं, जैसे- आलू पराठा, आलू टिक्की, आलू की सब्ज़ी, आलू का भरता, आलू चाप, आलू चिप्स, वगैरह-वगैरह. इतना ही नहीं, आलू किसी भी सब्ज़ी के साथ मिलकर उसका स्वाद बढा देता है. 

 


तो यह सुनकर आप लोग आलू का वहिष्कार करना न शुरू कर दें. बल्कि अपनी संस्कृति पर गर्व करें कि आपके पूर्वज पारखी थे. जिन्हें अच्छी और स्वादिष्ट चीज़ों का ज्ञान था. अगर नहीं होता तो आज आप आलू को इतना चटकारे लेकर नहीं खा रहे होते. 

इतना ही नहीं आप यह भी जान लीजिये की आलू में विटामिन सी, बी कॉम्पलेक्स, आयरन, कैल्शियम, मैंगनीज और फास्फोरस जैसे तत्व होते हैं। जो हमारे शरीर के लिए बहुत उपयोगी होते हैं. 

आलू के साथ साथ टमाटर, शिमला मिर्च, शकरकंद, शलजम,गाजर,काजू ,साबूदाना,अमरुद,लीची, मूंगफली, पपीता, कद्दू भी विदेशी हैं. इन्हें भी पुर्तगालियों द्वारा भारत लाया गया था. 

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